Wednesday, 29 June 2011

जब विरोध करना हो...


जब हमें विरोध करना हो तो अपने ही कार्य की तीव्रता बढ़ा लेंनी चाहिये...विरोधी सामने आ जायेगा।पर इसके पहले हमें ये सुनिश्चित करना होगा की हम "करते क्या हैं"...अगर,जीने की जद्दोजहद और उसकी पूर्ति,तो,ये तो जीवन का धर्म है...जीवन में हम ये धर्म "कैसे" पूर्ण करते हैं,यही जीवन का कर्म है...हमारा कर्म ही हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करता है...यानी हम अपने जीवन में धर्म का पालन कैसे करते हैं यही हमारा मूल कर्म होना चाहिये...

Sunday, 21 November 2010

सत्ता-शक्ति-धन बनाम धर्म-जाति-धन...




बचपन से ही हमें ये बताया जाता रहा है कि हम इसे पूजें...ये हमारी जाति का है...ये पैसे वाले हैं...साथ ही ये भी बताया जाता कि झूठ चोरी बेईमानी ये पाप है...तो इसका पालन हम अपने धर्म-जाति-धन के आधार पर करते रहे...ये करते-करते हमनें धर्म को सत्ता में, जाति को शक्ति में और धन को आधार रुप में परिवर्तित कर दिया या हो गया...नतीजा...हम देश के लिये नही अपितु अपने धर्म-जाति-धन के लिये जीने लगे...अब मुझे कोई समस्या नही दिखाई देती...वो बातें बचपन से जो बताई गईं हैं उसका आधार बदल कर देश कर दें...है ना आसान...तब तो इसे सब समझते होंगे...मैंने तो सिर्फ लिख दिया...तो ये अटका कहाँ है...चुनाव होते हैं...वहाँ तो कोई दबाव नही...तो फिर...वो समस्या कैसे हैं...जो बलात्कार करते हैं रुप चाहे जो हो...राजनैतिक हो...सामाजिक हो...आर्थिक हो...मानसिक हो...शारीरिक हो...सब एक जैसे हैं... क्यूँकि हम खुद चाहते हैं कि वो हो...जाने-अनजाने...क्यूँकि हमारे पास कोई दिशा नही है...नेता बन के हम क्या करते हैं...डाक्टर बन के... ईन्जियर,पुलिस, समाजसेवक, कलाकार, हर कोई... सब, सिर्फ पैसा कमा रहे है किसके लिये अपने लिये...तो दिशा कहाँ है, खुद, मतलब ब्रम्ह... अब हमने खुद को ब्रम्ह मानलिया तो दूसरा कहाँ जायेगा...तो धन खुद के लिये कमाना दिशा नही हो सकता...तो देश के लिये कमाया जा सकता है... फिर भी वो खुद का ही होगा...तो हम भी गर्व कर सकेंगे कि ये काम...ये विचार...ये धन इस देश का है...तो जीने की दिशा देश हो तो क्या बुरा है...सबकुछ खुद का ही तो होगा...अरे, करना क्या है कितनी बार देश का नाम जपना पडेगा बताओ और काम करने दो...जाने दें मुझसे गलती हो गई...ये समझाया नही जा सकता...ये सिर्फ जिया जा सकता है...तो बच्चों को कैसे समझायें...

RAPE...SCAM...RELIGIOUS PRESSURE....
ये घटनायें निश्चित रुप से अमानवीय है...पर क्या यह नया है...नही...तब...हम क्यूँ होने देते हैं...क्यूँकि हम देश के लिये नही अपने लिये जी रहे हैं...’हम’ ऐसा सोचते हैं इसलिये ’यह’ ऐसा है...हम कभी नही सोचते कि ’देश’ ऐसा है इसलिये हम ऐसा कर रहे है या सोच रहे हैं...अब सीधा सवाल आयेगा देश क्या है?...संविधान...भारत की दंड और आचार सहिंता...य़ॆ तो हम नही जानते...क्यूँ...क्यूँकि हमे देश के आधार पर नही जीना आता,हमें सिखाया नही गया...हमे अपने आधार पर जीना है...’अपना’ आधार क्या है...सत्ता-शक्ति-धन...’बस’...इसमें देश कहाँ आता है...देश इस्तेमाल होते हुये जरुर दिखता है...यह तीनों सत्ता-शक्ति-धन, अगर ’देश के लिये’ नही है तो वह बीमारी से ग्रसित होगा...और हम बडे शान से यह बीमारी बचपन से ही बच्चों को दे रहे हैं...धर्म-जाति-धन के आधार पर...आगे जाके ये सत्ता-शक्ति-धन में परिवर्तित हो जाती है...तो सोचो क्या ये भाषणों से ठीक होगा?वो व्यर्थ उत्तेजना पैदा करता है...grassroot level पर काम करना होगा,मतलब पंचायत के माध्यम से...है ना कठिन...इसीलिये इस प्रकार की दुर्घटना आहत करती है...झिंझोड़ती है...कानून तोड़ने को बाध्य करती है...पर फिर भी मानव समाज को अमानवीय नही मान पाता...वो बीमार लोग हैं...ये ’एक’ प्रकार है...हम निराश नही हैं...यह तो खुद से युद्ध है...पर हमारे पीछे देश है.... हम देश समझें...कवि पाश ने सही कहा है...भारत- मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द,जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाये,बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं।याद रहे हमारी ताकत उनसे कहीं ज्यादा है...हमें इक्ठा भी नही होना...हमारा काम और हमारी जीवन पद्धति ही उनके लिये ’काल’ होगा...तुम्हारे सामने प्रमाण है...

Monday, 25 October 2010

अहम् की तुष्टि

इधर कुछ दिनों से देख रहा हूँ कि हम सब कुछ बदलना चाह रहे हैं ...कोई साथ है या नहीं इसकी परवाह किये बगैर ये एक तरह से तो अच्छा है पर हम केवल इसके सिद्दांत पर ही बात करते हैं, ये यथार्थ में कैसे होगा ये तय करना जरुरी है जब हम किसी वाद पर बात करते हैं ,तो जानते हैं कि ये भी हल नहीं रास्ता है तो हल क्या है, शायद खुद की विवेचना जिससे हम गुरेज़ करते हैं, हल हम खुद हैं इसलिए हमें पता होता है कि क्या होना चाहिए, फिर वो होता क्यूँ नहीं? खुद उसका पालन हम व्यक्ति ना होकर नागरिक है,इसलिए कि हम संविधान के अधीन है, तो समझना होगा वरना हमारे बदलने से कुछ होगा नहीं सिवाय अहम् की तुष्टि

Wednesday, 29 September 2010

हम रोक सकते हैं...




हम रोक सकते हैं...
अगर हम वो ना सोचें जो ’वो’ बाध्य करते हैं,सोचने को..हम जानते हैं कि जो बहस का मुद्दा है...हमारे या किसी के,हिलाने-तोड़ने से कुछ होगा नही ’उसे’...वो तो सत्य है समय है सनातन है...हम वो सोचें जो हम सोचना चाहते हैं...हम खुद वो सोच पैदा करें...हम खारिज करना सीखें...हम शब्दों के शतरंजी बिसात से बचें...और उनके बीच रहें...हम आपस में बात करें...हम उनकी बात क्यूँ करें...वो चाहते हैं हम उनकी बात करें...हम अपनी बात करें...हम समझें की हमारी बात क्या है...कि, वो ना हो...तो, हमें भय किससे...
कुछ भी हो जाये वो नही होगा, जो हम नही चाहते...हम की ताकत समझें...जीत हमारी है...क्यूँकि हम वो नही चाहते....तो वो नही होगा..

Tuesday, 20 July 2010

ज़िम्मेदारी...


जहाँ भी पानी बरसा पानी-पानी ही हो गया।सबलोग किसी ना किसी विभाग को कोसने लगे।हमने खुद को जिम्मेदारी से मुक्त रक्खा, क्यूँ ? ये मेरी समझ के बाहर है।सफ़ाई करने की और रखने की चीज़ है सिर्फ़ सफ़ाई करने से साफ़ नही रहता।साफ़ रखना तो पडेगा ना और वो हमें ही रखना पडेगा।हम जिम्मेदार बनें।

Tuesday, 6 July 2010

बंद...


बंद को लेकर उलझन भी है और परेशानी भी कि क्या ये तरीका है सुधार का, बदलाव का!
जब हम बच्चे थे तो हमारे पास सिर्फ़ बंद करने अतिरिक्त और कोइ रास्ता था नही,माता-पिता के सामने और धीरे-धीरे हम भी इसका अभ्यास कर लेते थे अलग-अलग तरीके से। अब शायेद भूल गये हैं।
राजनिति भी वहीं से संचालित होती है...जीवन से...हम ये समझ नही पा रहे हैं कि अपने ज़मीन को देखें कैसे...मूर्खतापूर्ण लगता है ये,ज़मीन को क्या देखना...मैने देखने की कोशिश की तो अपने सातवें पुश्त पर जाकर रुका...मेरी समझ ये आया कि खुद को समझने के पहले ज़मीन समझने कोशिश करें... मैं पैदा हुआ बिहार।पिता जौनपुर लखमापुर,खेतासराय।माता बनारस शाजहाँपुर।अब ये सिर्फ़ जगह नही है ये अलग-अलग संस्कृतियाँ हैं संस्कार हैं और अब मैं इन सब का मिश्रण हूँ।
तो अब हुआ क्या रहता मुम्बई में हूँ, तो, है ना उलझाउ,ये काम था, व्यवस्था का, कि वो इसे सरल बनाती...क्यूँकि हम अपने देश के किसी भी हिस्से में हों उसका कम से कम छ्ह हज़ार साल पुराना प्रमाण हमारे सामने होगा...हम मानते हैं कि देश ६५साल पहले आज़ाद हुआ...अब ६५ के सामने छ हज़ार कुछ ज्यादा ही अंतर लगता है।६५ साल में हम विकसित हो गये और स्व्तंत्र हो गये अपने अपने ढंग से।पर हम आस्था विश्वास सबंध शर्म ये नही छोड़ सके। ये शरीर के अंदर होता है,ये अपने आप कहीं से निकलता है और हम खु़द नही समझ पाते।हम उपर से कुछ भी पहन लें, बोलें लें, कैसे भी रह लें, ये नही बदलता।दुनिया का ये एक ऐसा देश है जहाँ जीने का रास्ता है, तरीका है,व्य्वस्था है, धर्म नही है।***ग्रंथ कहते हैं कि कर्म ही धर्म है और हम उसे ही नकार रहे हैं।यानी हम जो करते हैं वही हमारा धर्म है,आसान है।तो समस्या कहाँ है... राजनिति की समझ का ना होना...ये आरोप नही है ये उनकी चालाकी है...वो धर्म जाति बन गई और जाति आरक्षण।वो बाँट-बखरा अभी भी चल रहा है..हम शामिल हैं...और पूछते हैं बंद से क्या होगा...अपनी सुविधा क ख्याल थोडा़ कम करना चाहिये और थोडा़ ज्यादा दूसरे का ख्याल कर लें..विश्वास करें ये इतना ही सरल है...